नरेन्द्र मोदी पर कविता

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नरेंद्र मोदी पर कविता

उभरा एक नेता महान

कांग्रेस के घोटालों ने जब छुआ आसमान।
एक नेता देश में बनके उभरा महान।।

बनके उभरा महान, रैलियों में लाखों आये।
गोदी में बैठे बच्चे भी मोदी मोदी चिल्लाये।।

मोदी मोदी बोल के भर दी मोदी की झोली।
फिर धीरे धीरे मोदी ने कांग्रेस की पोल खोली।।

कांग्रेस की खोली पोल बदला चुनावी भूगोल।
घूम रहे राहुल संग विपक्षी देखो गोल-गोल।।

गोल-गोल घूमे विरोधी, मोदी पड़ रहे भारी।
समझे ना क्यों हुई दीवानी, मोदी की दुनिया सारी।

दुनिया सारी दीवानी, मोदी का कर रहे यशोगान।
जैसे जैसे मोदी यशोगान, राहुल हुए नादान।।

प्रधानमंत्री मोदी देश के ही नहीं विश्व नेताओं में से भी एक विख्यात मुखर वक्ता हैं,
उनके ओजस्वी भाषण से तो हम सभी का परिचय है लेकिन वह कविताओं और साहित्य के भी प्रेमी हैं।
प्रधानमंत्री मोदी न सिर्फ़ विभिन्न अवसरों पर दूसरे कवियों व शायरों की रचनाएं पढ़ते हैं बल्कि वह स्वयं भी
कविताएं लिखते हैं। पेश हैं कुछ ऐसे ही मौके जब उन्होंने किसी कवि की कविता पढ़ी 
तो कभी स्वयं की लिखी रचना पढ़ी। 

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री लाल किले से देश को संबोधित करते हैं
 उनके भाषण में कई ख़ास बातों के साथ एक बात 
यह भी रही कि उन्होंने अपने भाषण की समाप्ति एक कविता के साथ की थी, पढ़ें वह कविता 
नरेन्द्र मोदी पर कविता

अपने मन में एक लक्ष्य लिए 
मंज़िल अपनी प्रत्यक्ष लिए
हम तोड़ रहे हैं जंजीरें
हम बदल रहे हैं तस्वीरें
ये नवयुग है, नव भारत है
खुद लिखेंगे अपनी तकदीरें
हम निकल पड़े हैं प्रण करके
अपना तन-मन अर्पण करके
जिद है एक सूर्य उगाना है
अम्बर से ऊँचा जाना है
एक भारत नया बनाना है
एक भारत नया बनाना है

यह कविता गुजराती में लिखी गयी है। 

समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला
मारा आ तमनममां उभरे तरणेतरना मेणा

कोई पासे नहीं लेवुंदेवुं: कदी होय नहीं मारुंन्तारुं
आ दुनियामां जे कैं छे के मनगमतुं मणियारुं

रस्तो मारो सीधोसाधो: नहीं भीड़: नहीं ठेलमठेला
समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला

कोई पंथ नहीं: नहीं संप्रदाय: माणस ऐ तो माणस,
अजवाणामां फरक पड़े शुं? कोडियुं हय के फानस

झणांझणां झुम्भरनी जेवां क्यारेच नहीं लटकेला
समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो 
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो 
बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं 
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता 
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो

यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें 
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

हर इक सफ़र को है महफ़ूस रास्तों की तलाश 
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो

कहीं नहीं कोई सूरज, धुआँ धुआँ है फ़िज़ा 
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो

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