भारतीय राजव्यवस्था

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प्रश्न 1. उद्देशिका का महत्व

उत्तर भारतीयसंविधान की उद्देशिका का आधार जवाहर लाल नेहरू द्वारा तैयार किया गया वह प्रस्ताव है जो 13 दिसंबर 1946 को संविधान निर्मात्री सभा में प्रस्तुत किया गया। भारतीय संविधान की उद्देशिका में शासन व्यवस्था के मूल आधारों, उसके दर्शन, उसके स्वरूप, लक्ष्यों का उल्लेख है। उद्देशिका संविधान का परिचय कराती है इसे संविधान की आत्मा कहा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बेरूवाड़ी मामले में निर्णय देते हुए कहा था कि उद्देशिका संविधान निर्माताओं के आशय स्पष्ट करने वाली कुंजी है। 1976 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह दृष्टिकोण प्रतिपादित किया कि उद्देशिका संविधान का अंग है और इसमें संविधान की मूल विशेषताएं उल्लेखित हैं। भारतीय संविधान की उद्देशिका की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह अत्यधिक संक्षिप्त होते हुए भी उन समस्त आदर्शों और सिद्धांतों का उल्लेख करती है जो भारतीय संविधान की आधारशिला है।

प्रश्न2 भारतीय संसद का ह्रास

उत्तर भारतीयसंविधान के अनुच्छेद 79 से 123 तक संसद के संगठन, उसकी कार्य-प्रक्रिया, उसके पदाधिकारी, विशेषाधिकारों आदि का विस्तार से उल्लेख किया गया है। यद्यपि भारतीय संसद की स्थापना ब्रिटिश संसद के आधार पर की गई है। लेकिन दोनों में मौलिक अन्तर है। भारतीय संसद को अधिकार और शक्तियां संविधान से प्राप्त हैं। संसद संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं में रहकर कानून का निर्माण करती है और यदि उन सीमाओं का अतिक्रमण करती है तो उच्चतम न्यायालय ऐसे कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है। भारतीय राजनैतिक व्यवस्था में ऐसी प्रकृति देखने को मिल रही है जो संसद के ह्रास के लिए जिम्मेदार है। विभिन्न राजनीतिक दल अपने हितों का ध्यान रखने हेतु राष्ट्रीय हित को बढ़ावा देने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। संसदीय क्षेत्र में सबसे अधिक गिरावट अध्यक्षों उच्च सदनों के सभापतियों के स्तर में आयी है। विपक्षी दलों द्वारा रचनात्मक स्तर पर सत्ता का सहयोग करके केवल सदन को बाधित करने का प्रयास किया जा रहा है। अतः उपरोक्त सीमाओं के निराकरण द्वारा ही संसदीय ह्रास की प्रवृत्ति रोकी जा सकती है।

प्रश्न3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद-32 के महत्व का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर संविधानका अनुच्छेद-32 नागरिकों को संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्रदान करता है। जिसका प्रयोग करके नगारिक अपने मूल अधिकारों को उच्चतम न्यायालय की सहायता से सुरक्षित रख सकते हैं। डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद-32 को संविधान का हृदय तथा आत्मा कहा है। इसी प्रकार का उत्तरदायित्व अनुच्छेद 226 में उच्च न्यायालय को सौंपा गया है। संविधान के इन प्रावधानों के अनुसार प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक अधिकार है कि यदि सरकार के किसी कार्य या कानून द्वारा उसके मूल अधिकार का अतिक्रमण होता है तो वह उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय से उसे सुरक्षित रखने की मांग कर सकता है। अनुच्छेद 32(2) में उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों को कार्यान्वित करने के उद्देश्य से ऐसे निर्देश/आदेश/रिट जिनके अन्तर्गत बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिशेध, अधिकार प्रच्छा और उत्प्रेषण रिट है, को निकालने की शक्ति प्राप्त है।

प्रश्न4. 73वें संविधान अधिनियम के विशेष संदर्भ में पंचायती राज संस्थाओं का परीक्षण कीजिए।

उत्तर ग्रामीणविकास के लिए स्थानीय संस्थाओं की संरचना, अधिकार एवं कार्यों को संविधान में स्थापना हेतु 23 अप्रैल 1993 से सम्पूर्ण भारत में 73वां संविधान संशोधन लागू किया गया। संविधान के भाग 9 में अनुच्छेद 243 (A से O तक) पंचायती राज के विषय में उल्लेख किया गया है। पंचायती राज के माध्यम से भारत में शासन के विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देने हेतु अनेक कदम उठाए गए हैं। जिसमें पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष, ई-गवर्नेंस परियोजना, महिलाओं को पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण आदि जैसे उपाय शामिल हैं। पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष में विकेन्द्रीकृत, सहभागीय और समग्र नियोजन प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जाता है। जबकि ई-गवर्नेंस परियोजना के अन्तर्गत पदाधिकारियों को सूचना तकनीक से जुड़ी सेवाओं की सम्पूर्ण रंेज प्रदान करना है। पंचायती राज संस्थाओं की योजनाओं को प्रस्तुत करते हुए तीन स्तर क्रमशः ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद का गठन किया गया है।

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