तुलनात्मक और प्रयोगशील दृष्टिकोण

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किसी भी वैज्ञानिक परिकल्पना की कई स्थितियों में जांच की ज़रूरत होती है। इस तरह की विभिन्नताएं मानवीय प्रबंधन से सृजित की जा सकती हैं जो प्रयोगशील तरीका है। या प्राकृतिक विभिन्नताओं का फायदा उठाया जाए जो तुलनात्मक विधि है। सामान्य प्रणालियों पर आधारित परिकल्पनाओं की जांच कई बार प्रयोगात्मक रूप से की जा सकती है। इस तरह की सामान्य परिकल्पनाएं किसी बड़ी खोज की ओर ले जा सकती हैं। किसी भी परिकल्पना की पुष्टि कई प्रयोगों से की जाती है। प्रयोगों के दौरान पूरी प्रक्रिया को बहुत गौर से देखा जाता है। भौतिक शास्त्र, रसायन विज्ञान और शरीर विज्ञान हुईं प्रगति में इसी तरह की प्रयोगात्मक विधियों का हाथ है। धातु विज्ञान, पारिस्थितिकी या विकासवादी जीवविज्ञान जैसी कहीं अधिक विषयों में बहुत सी दिलचस्प परिकल्पनाओं के प्रयोग के आधार पर पुष्टि नहीं हो पाती है। मसलन विकासवादी सिद्धांत के मुताबिक पुरुष और स्त्री में आकार और रूप में जिस स्तर तक एक दूसरे से अलग होते हैं, उसी अनुपात में साथी के लिए प्रतियोगिता बढ़ती जाती है। लेकिन इस परिकल्पना की पुष्टि जांच द्वारा नहीं हो पाती है। हालांकि जानवरों के कई समूह हैं जहां नर एक या अधिक मादाओं से जोड़े बनाता है। गौरैयों की कई प्रजातियों में एक नर एक समय में एक मादा से जोड़ा बनाता है। दूसरी ओर बया पक्षी एक ही मौसम में कई मादाओं से जोड़े बनाता है। ऐसे में कोई यह अनुमान लगा सकता है कि बया पक्षी, गौरेया पक्षी की तुलना में नर और मादा के बीच अधिक अंतर प्रदर्शित करता है। इस परिकल्पना की जांच नर और मादा बया तथा गौरेया पक्षी के रंग में चमक या फीकेपन की माप से की जा सकती है। यह प्राकृतिक प्रयोगों का लाभ लेकर निष्कर्ष पर पहुंचने का तुलनात्मक तरीका है।

फिलहाल पर्यावरणीय जागरुकता वाले पाठ्यक्रम के तहत जो परियोजनाएं ली जाती हैं उनकी प्रवृति वर्णनात्मक होती है। उदाहरण के तौर पर किसी क्षेत्र में चिड़ियों की प्रजातियों की सूची बनाना या किसी एक गांन में पीने का पानी जुटाने के तौर-तरीकों का की जानकारियां इकट्ठी करना। नियमबद्ध तरीके से सूचना जुटाना निश्चित रूप से उपयोगी होता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम सूचनाओं के पार जाकर उन सूचनाओं को विभिन्न परिकल्पनाओं से जोड़ कर देखें। ऐसे करने पर हमें कई स्तरों पर समानताओं का एक क्रम नज़र आएगा। इस तरह की संभावित समानताओं के क्रम से छात्रों के भीतर प्रयोग करने के प्रति रुचि बढ़ेगी। विभिन्न परिकल्पनाओं को प्रस्तुत करते समय यह ज़रूरी है कि हर परिकल्पना के पीछे की वैज्ञानिक समझ को स्पष्ट किया जाए। इससे उनके अनुशासनात्मक ज्ञान को बढ़ाने में और मदद मिलेगी।

लैंगिक द्विरूपता नर और मादा पक्षी के बीच फर्क के उदाहरण को फिर लेते हुए एक खास परियोजना पर विचार किया जाए। उम्मीद की जाती है कि चिड़ियों में वैसी प्रजातियों में साथी के लिए प्रतियोगिता कम से कम हो जहां वे न केवल एक घोसला सत्र बल्कि पूरे जीवन के लिए एक साथी बनाते हों। इस तरह की प्रजातियों में उम्मीद की जाती है कि नर और मादा एक समान दिखते हों और उनमें एक साल में या गैर प्रजनन सत्र से प्रजनन सत्र के बीच कोई बदलाव न हो। इस तरह की प्रजातियों को एकरूपक कहा जाता है। ये रूप या आकार में एक एकल वयस्क दिखते हैं। ऐसे में कोई यह परिकल्पना कर सकता है कि एकरूपक जीवों में पूरे जीवन भर के लिए जोड़े बनाने की प्रवृत्ति गैर-एकरूपक पक्षियों की प्रजातियों के मुकाबले अधिक होती है। उदाहरण के तौर पर पुणे के आसपास आम एकरूपक प्रजातियां मसलन घरेलू कौआ, जंगली कौआ, मैना और बुलबुल है। दूसरी ओर आम गैर-एकरूपक प्रजातियों में बया, फुलसुंघनी, तोता और दंहगल आदि हैं।

लेकिन इस परिकल्पना की जांच कैसे की जाए ? एकदम सही जांच के लिए तो ज़रूरी होगा कि उन पक्षियों को पिंजड़े में कैद पर उन पर सालों तक नज़र रखी जाए। यह एक छात्र परियोजना के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके लिए कुछ सामान्य लेकिन अर्थपूर्ण जांच के तरीके निकालने की ज़रूरत है। जीवन भर एक जोड़े में रने वाले पक्षियों के बारे में एक साथ रहने और साथ-साथ आने-जाने की उम्मीद की जाती है। इसलिये जीवन भर के लिए जोड़ा बनाकर रहने वाले प्रजातियों से उम्मीद की जाती है कि उनमें कुछ सामाजिक इकाइयां होंगी। मसलन उनके साथ कुछ छोटे बिना जोड़े वाले पक्षी और विधवाएं होंगी। चिड़ियों की अधिकतर प्रजातियों में युवावस्था का चरण उनके पूरे जीवन के मुकाबले बहुत छोटी अवधि का होता है। इसलिए आजीवन जोड़े वाले पक्षियों में जोड़े एक बहुत ही प्रभावी सामाजिक इकाई के रूप में उभरते हैं। यही कारण है कि असमान संख्या 1,3,5 के मुकाबले ज्यादातर समय 2,4,6 के समान संख्या में दिखाई देने पर इन पक्षियों के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है कि वे पूरे जीवन के लिए जोड़े बनाने वाली प्रजातियों में हैं।

ऐसे में इस परियोजना की शुरूआत अपने अध्ययन क्षेत्र में आसानी से दिखने वाले पक्षियों की प्रजातियों की सूची बनाने से की जा सकती है। पर्यवेक्षण के साथ-साथ किताबों से भी उन पक्षियों को एक रूपक या गैर-एकरूपक श्रेणी मे बांटा जा सकता है। किताबों से मदद लेने की सलाह इसलिये भी दी जाती है क्योंकि कुछ गैर-एकरुपक पक्षियों में केवल प्रजनन सत्र के दौरान नर-मादा का अंतर दिखता है। गैर-प्रजनन सत्र के दौरान ये एकरुपक नज़र आ सकते हैं।

सामान्य और आसानी से पहचाने जा सकने वाले पक्षियों की प्रजातियों की पहचान और उनकी सूची बनाने के बाद हर प्रजाति के पक्षियों के रूप-रंग, आकार पर नज़र रखी जा सकती है। हर प्रजाति में २०० या उससे अधिक नमूने मिल सकते हैं। पर्याप्त मात्रा में नमूने इकट्ठे हो जाने के बाद हर झुंड में समानताओं और असमानताओं के विश्लेषण की ओर बढ़ा जा सकता है। इस प्रक्रिया में प्रजातियों की एक सूची तैयार होगी (क) एक ही आकार के पक्षियों की तादाद ज्यादा होगी जिनकी तुलना (ख) ऐसे पक्षियों से की जा सकेगी जो इस श्रेणी में नहीं आएंगे। हमारी परिकल्पना के लिए ज़रूरी है कि (क) श्रेणी में एकरुपक पक्षियों की संख्या काफी अधिक हो और (ख) श्रेणी में एकरूपक पक्षियों की संख्या बहुत कम हो। अगर दोनों स्थितियां बनती है तो परिकल्पना को स्वीकार किया जा सकता है वर्ना इसे खारिज़ कर देना चाहिए।

यह परियोजना प्रकृति के रहश्यों को की खोज में विज्ञान की ताकत की भूमिका पर रोशनी डालती है। हम यह नहीं जानते कि परिकल्पना बाद में जाकर वैध साबित होगी ही। दोनों ही स्थितियों में आगे की जांच के लिए दिलचस्प संभावनाएं ज़रूर बनती हैं। उदाहरण के लिए अगर परिकल्पना खारिज़ भी होती है तो संभव है कि वह सभी एकरूपक पक्षी प्रजातियों के लिए न सही, लेकिन उनके लिए अभी भी वैध हो पेड़ की कोटर जैसी छोटी जगह का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी ओर अगर परिकल्पना बहुसंख्यक एकरूपक प्रजातियों के लिए स्वीकृत होती है तो भी यह कुछ खास एकरूपक प्रजातियों पर लागू नहीं भी हो सकती है। यह जानना बहुतक उपयोगी होगा कि क्या इस तरह की प्रजातियों में कुछ गुण मसलन छोटा आकार या जंगल में रहने के तौर तरीकों में एक जैसे हैं। निश्चित रूप से विज्ञान की परिकल्पना-निष्कर्ष विधि से प्रकृति को गहराई से जानने की अपार संभावनाएं खोलता है।

हम आगे जांच योग्य परिकल्पनाओं के रूप में 202 परियोजना सूत्रों की श्रृंखला पेश कर रहे हैं। इनमें से 94 पर हम वैधता की व्याख्या, कार्यप्रणाली पर एक टिप्पणी और बाद की कार्रवाई के लिए सलाह भी दे रहे हैं। पानी पर आधारित 31 परिकल्पनाओं को नीले रंग से रेखांकित किया गया है। इन्हें आखिरी हिस्से में अलग से भी सूचीबद्ध किया गया है।

 

Any scientific hypothesis needs to be tested in many situations. Such variations can be created through human management which is an experimental method. Or take advantage of natural variations which is the comparative method. Hypotheses based on general systems can sometimes be tested experimentally. Such general hypotheses can lead to some great discovery. Any hypothesis is confirmed by several experiments. The whole process is carefully observed during the experiments. Similar experimental methods have contributed to advances in physics, chemistry and physiology. In far more disciplines such as metallurgy, ecology or evolutionary biology, many interesting hypotheses remain unconfirmed by experiment. For example, according to evolutionary theory, the degree to which males and females differ from each other in size and form, proportionately increases in competition for mates. But this hypothesis could not be confirmed by investigation. However, there are many groups of animals where the male mates with one or more females. In many species of sparrows, one male mates with one female at a time. On the other hand, the Baya bird mates with several females in a single season. So one can infer that the bay bird exhibits more difference between male and female than the sparrow bird. This hypothesis can be tested by measuring the brightness or discoloration of male and female bay and sparrow birds. It is a comparative method of arriving at conclusions by taking advantage of natural experiments.

Presently, the projects taken up under environmental awareness courses are descriptive in nature. For example, making a list of bird species in an area or collecting information about the methods of collecting drinking water in a village. Gathering information in a systematic manner is certainly useful. Our effort should be that we go beyond the information and try to connect those information with different hypotheses. In doing so, we will see a sequence of similarities on many levels. The sequence of such possible similarities will increase the interest of the students to experiment. When presenting various hypotheses, it is important to explain the scientific understanding behind each hypothesis. This will further help in enhancing their disciplinary knowledge.

Taking again the example of sex dimorphism difference between male and female bird, a special project should be considered. Hummingbird competition is expected to be minimal in species where they form not only a nesting session but a mate for life. In such species, males and females are expected to be similar in appearance and may not change within a year or between breeding seasons from non-breeding seasons. Such species are called monoecious. These form or shape resemble a single adult. As such, one can hypothesize that monogamous organisms have a greater tendency to form pairs for the rest of their lives than non-monogamous bird species. For example, around Pune there are common monogamous species such as domestic crow, wild crow, myna and bulbul. On the other hand common non-monogamous species are Baya, Phulsunghani, Parrot and Danggal etc.

But how to test this hypothesis? For an accurate test, it would be necessary to monitor those birds in cages for years in captivity. It is not suitable for a student project. This requires some simple yet meaningful investigation methods. Birds that have lived in a pair for a lifetime are expected to live together and mingle together. Therefore species that remain in pairs for life are expected to have some social units. For example, there will be some small unpaired birds and widows with them. In most species of hummingbirds, the puberty stage is of a very short duration compared to their entire life. Therefore, pairs emerge as a very effective social unit in birds with lifelong pairs. This is the reason why these birds can be inferred that they are a species of pair for life, appearing most of the time with the same number as 2,4,6 as against the dissimilar number 1,3,5.

In such a situation, this project can be started by making a list of easily visible bird species in your study area. Along with observation, those birds from books can also be grouped into a metaphorical or non-uniform category. It is also advisable to seek help from books because some non-monogamous birds show only male-female differences during the breeding season. They may appear monogamous during the non-breeding season.

Once common and easily identifiable bird species have been identified and cataloged, the morphology and size of each species can be tracked. Each species may contain 200 or more specimens. Once a sufficient number of samples have been collected, one can move on to the analysis of similarities and dissimilarities in each herd. In this process a list of species will be prepared which will (a) have more number of birds of the same size which can be compared with (b) birds which will not fall in this category. Our hypothesis requires that (a) homogeneous in series

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